शिल्प जिला-सांस्कृतिक धरा कोंडागांव में शिल्प एवं लोकचित्रकला का उदभव

  • घड़वा शिल्प :- जन श्रुति है कि पहाड़ी के पास एक चटटान के ऊपर कुछ सूखी लकडि़या जल रही थी शायद आग  की गर्मी के चटटान दरक गर्इ। उसी दरके हुए स्थान से कुछ वस्तु बह कर जमी हुर्इ थी। इससे पहले ऐसी चीज देखी नहीं गर्इ थी वह व्यक्ति जिसने उसे देखा था उसने उस वस्तु को जिज्ञासावश  उठा लिया। व अपने निवास पहुचां तथा उसने अनोखी वस्तु को बडे़ जतन एक कोने में रख दिया। उत्सुकतावश  अन्य लोग उसके निवास पर गए, देखा की उसके निवास की कोने में रखी हुर्इ वही अनोखी वस्तु है पूछने पर उसने सारी घटना सूना दी तब उन्होंने अनोखी वस्तु की मांग की, हमें भी ऐसी वस्तु ला कर दो । इस बात को लेकर वह दुगने उत्साह से दूसरे दिन उसी स्थान पर पुन: गया। उसे पहले से भी और अनोखी चीज दिखार्इ दी जो कुछ दूरी पर जमीन में थोड़ी सी गड़ी हुर्इ थी जिसे उसने खुरचकर बाहर निकाला। इस वस्तु में दुसरी किस्म की आकृति दिखार्इ दी तथा वह पहले की वस्तु से चमकीली थी। जिस स्थान पर वह वस्तु मिली उसी के आस पास मधुमकिखयों की छतेनुमा अन्य वस्तुएं भी थी। यह उस वस्तु पर लिपटी हुर्इ थी जो दीमक की मिटटी थी, जिसे खुरचकर अलग किया गया था। अनोखी आकृति वाली वस्तु को उसने आसपास की लकडि़यों, घासपूस आदि इकटठा कर आग लगार्इ और उस आग में उसे डाल दिया और अपने निवास में लौट आया। दूसरे दिन जाकर देखा तो वह एक अदभुत आकृति की मूर्तिनुमा वस्तु दिखार्इ दी। मांग करने के अनुसार वह अनेक प्रकार की आकृतियो वाली अनोखी वस्तृओं का निर्माण करने लगा । धीरे-धीरे जरूरत अनुसार सामग्री एकत्रित करत गया और अपने मन के अनुसार मुर्तियां बनाता गया। कालान्तर में यही प्रकि्या गढ़वा कला अथवा घड़वा कला के नाम से जानी जाने लगी। किसी भी मूर्ति या चित्र निर्माण करने के पूर्व मन में कल्पना करना ही गढ़ना कहलाता है

  • लौह शिल्प :- पाषण युग में मानव शिकार के लिए पत्थरों से अस्त्र-षस्त्र बनाकर उसे हथियार के रूप में इस्तेमाल किया करते थे। उसने हिरन को देख निषाना साधकर प्रहार किया। प्रहार करते समय निषाने की सीध मे दीमकों द्वारा बनायी गर्इ एक लंबी खड़ी बांबी भी थी, उसने आव देखा न ताव औजार चला दिया। औजार बांबी से टकराते हुए उस हिरण को लगा, हिरण तत्काल मर गया। लेकिन औजार की टक्कर से बांबी (दीमक) के ऊपरी हिस्से पर छेद दिखार्इ दिया। वह छेद में झांक कर देखा तो उसे बड़ा सा चूहा दिखार्इ दिया। उसने झट से पास में पडे़ पत्थर के टुकड़े को उठाकर उस बांबी के छेद को बंद किया। तथा अपने शिकार को लेकर वह निवास की ओर चल पड़ा । दुसरे दिन के लिए भी एक शिकार की व्यवस्था पहले से हो चुकी है। इसका एहसास कर वह उस स्थान पर पहुंचा जहां उसने बांबी का मुह पत्थर से बंद किया था। उसने उस बांबी के चारों ओर ढेर सारी सूखी लकडि़या एकत्रित की और उसमें, उसने आग लगा दी । आग लगने पर बांबी के ऊपर रखा हुआ पत्थर गर्मी से पिघलने लगा तथा पास में पेड़ की ठूंठ जैसी आकृति की एक अदभूत वस्तु दिखार्इ दी। इसके बाद उसने लकडि़यां सूखे पते आदि एकत्रित कर उस पत्थर के टुकड़ों के चारों ओर आग लगा दी । आग की गर्मी से पत्थर पिघलने लगा, पिघलकर इधर-उधर फैलने लगा और जहां आकृति मिलती गर्इ, पिघले हुए लोहे का आकार बन गया। इसी पिघली हुर्इ वस्तु से निर्मित वस्तओं में सबसे पहले अस्त्र-षस्त्र बनाया गया। उसे नुकीला रूप दिया और उससे शिकार के रूप मे इस्तेमाल किया जाने लगा तथा उपयोग के अनुसार कृषि उपकरण वादययंत्र, मूर्तियां आदि बनार्इ गर्इ।
  • लोकचित्र :-मानव जीवन में लोक चित्र परंपरा का अनुपम स्थान रहा है। समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाली सभी प्रकार की संस्कारों में इस अंचल में लोकचित्रों की अपनी एक विषेशता रही है। बस्तर अंचल में इस परंपरा के अन्तर्गत जमीन पर चावल के आटे से यह उसके घोल बनाकर बनाया जाने वाला चिन्ह जो संस्कृति के प्रतीक के प्रतीक चिन्हों को दर्षाया जाता है उसे बाधा लिखना कहते है। इसी तरह छुर्इ मिटटी गेरू मिटटी तथा पीली मिटटी का भी इस्तेमाल घरों में, दीवारों में बनाया गया है। दीवारों में अंकित किये जाने वाले चित्रांकन को भितित लोक चित्र कहते है।कोण्डागांव अंचल में धान की फसल कटार्इ के बाद होने वाला सबसे बड़ा महापर्व लछमी-जगार (लक्ष्मी जगार) होता है। 'लछमी -जगार एक स्थानीय बोली हल्बी का एक महाकाव्य है। व्यकितगत अथवा सार्वजनिक रूप से भी पूरी श्रद्धा एवं मनोयोग से जगार का आयोजन किया जाता है। आयोजन स्थल की दीवार पर चित्रांकन किया जाता है। इस चित्रांकन में महाकाव्य की कथा के विशेष  पात्रों के चित्रांकन में महाकाव्य की कथा के विषेश पात्रों के चित्र बनाये जाते है। चित्रांकन के लिए गेरू मिटटी से पोतकर उसमे चित्रांकन चावल के आटे का घोल या फिर सफेद छुर्इ मिटटी के घोल से चित्र बनाया जाता रहा है। इसी तहर गुफाओं में शैल चित्र भी बनाए गए है । घोटुलों में, चित्रांकन तथा मृतक स्मृति स्तंभों में भी चित्रांकन देखा गया है। यहां उल्लेख करना उचित होगा कि बस्तर में जनजातियों द्वारा किसी बुजुर्ग व्यकित के मृत्योपरान्त मृतक स्मृति स्तंभ भी बनाया जाता है, जिसे हम 'मेमोरी पिल्लर कहते है। तहले इस स्तंभ (लकड़ी का स्तंभ) में कार्विंग करत थे लेकिन आज इसका रूप चौड़े पत्थर ने ले लिया है जिस पर चित्रांकन आयल पेंट, इनैमलपेंट' से चित्र बनाया जाने लगा है।इस तरह लोकचित्र की परंपरा विभिन्न स्थानों में विभिन्न अवसरों के अनुसार गतिमान है।माटी शिल्प, घड़वा कला, और लौह षिल्प तथा भितित चित्रकला आदि में कोण्डागांव  विश्वविख्यात है।