जिले का इतिहास

इतिहास के आर्इने में कोण्डागांव

कोंडागांव के अतीत में प्रचलित है, कि इसका प्राचीन नाम कोण्डानार था। बताया जाता है कि मरार लोग गोलेड गाड़ी में जा रहे थे, तब कोण्डागांव के वर्तमान गांधी चौक के पास पुराने नारायणपुर रोड से आते हुए कंद की लताओं में गाड़ी फंस गयी। उन्हे मजबूरी में रात को वहीं विश्राम करना पड़ा। बताया जाता है कि उनके प्रमुख को स्वप्न आया। स्वप्न में देवी ने उन्हें यहीं बसने का निर्देष दिया। उन्होंने उस स्थान की भूमि को अत्यंत उपजाऊ देखकर देवी के निर्देशानुसार यहीं बसना उचित समझा। उस समय इसे कान्दानार (कंद की लता आधार पर) प्रचलित किया गया, जो कालान्तर कोण्डानार बन गया।

इसी बीच बस्तर रियासत के एक अधिकारी ने हनुमान मंदिर में वरिष्ठ जनों की एक बैठक में इसे कोण्डानार के स्थान पर कोण्डागांव रखना ज्यादा उचित बताया। उस समय का पुराना मार्ग पुराना नारायणपुर मार्ग ही था। अत: मरारों के मुख्य परिवारों की बसाहट उसी मार्ग के दोनों ओर हुर्इ। यही पुराना कोण्डागांव था।सन 1905 में केशकाल घाटी के निर्माण के बाद मुख्य सड़क बनी, जो गांधी चौक के पास पुराने नारायणपुर मार्ग से मिलती है। नया मार्ग बनने पर उसके दोनों ओर नर्इ बसाहट होने लगी। रोजगारी पारा नए मार्ग के दोनों ओर बसा। केशकाल घाटी की सड़क का निर्माण होने के बाद केशकाल का क्षेत्र राठौर परिवार को मालगुजारी में दिया गया। वह परिवार तथा इनसे संबंधित लोग बाद में कोण्डागांव मुख्य मार्ग पर बसे।

मुख्य सड़क धमतरी से जगदलपुर को जाती थी। इस प्रकार कोण्डागांव की मुख्य सड़क बस्तर की राजधानी जगदलपुर से जुड़ गयी । 1980 के दशक में इसे राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 घोषित किया गया है। अभी हाल मे 2010 में यही राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 30 घोषित किया गया है।रियासत काल में कोण्डागांव, बडेडोंगर तहसील के अंतर्गत था तथा उसका पुलिस स्टेशन भी बडेडोंगर में था। बाद में तहसील मुख्यालय कोण्डागांव 1943 में आया।

यहां बसने वाली सबसे पुराने मरार,कोष्टा तथा अनुसूचित जाति, जनजाति में गाण्डा, घसिया, हल्बा आदि थे। कोण्डागांव की बसाहट अच्छी होने पर यहां 1930 के आसपास प्राथमिक षाला बनी और कुछ वर्शो बाद एंग्लो वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल की स्थापना हुर्इ। सन 1953 में यहां मैटि्क की परीक्षा केन्द्र भी बन गया।1955 में पूर्वी बंगाल के व्यकितयों की बसाहट के लिए प्रशासनिक भवन तथा कर्मचारियों के आवास बनना शुरू हुआ। केन्द्रीय पुनर्वास मंत्रालय के अन्तर्गत दण्डाकारण्य प्रोजेक्ट बना जो उड़ीसा से बस्तर के इस क्षेत्र तक विस्तृत था। 1958 में यहां बिजली आर्इ जिसाका उदघाटन हार्इ स्कूल के प्राचार्य ने किया था।

1965 मे ही कोण्डागांव राजस्व अनुविभाग घोषित किया गया।कोण्डागांव रियासत काल में पूर्व में हटिया फिर शामपुर तथा बाद में सोनाबाल परगना के अंतर्गत लिया जाता था। कोण्डागांव का विकास क्रमश: तेजी से हुआ और कस्बे से शहर बना। पहले यह आदिम जाति पंचायत के अंतर्गत था तत्पष्चात 1975 में नगरपालिका परिषद् की स्थापना हुर्इ, नगर में विधाओं में प्रगति आर्इ है जिससे बेलमेटल शिल्प , लौह शिल्प , प्रस्तर शिल्प , मृतिका शिल्प लोक कला चित्र, काश्ठ, बांस, कौड़ी शिल्प और बुनकर शिल्प का यथेश्ट विकास हुआ।बेलमेटल शिल्प से बस्तर को विश्व स्तर पर ख्याति दिलाने का श्रेय कोण्डागांव के कलाकारों को जाता है। सांस्कृतिक क्षेत्र में सांस्कृतिक संस्थाएं स्थापित हुर्इ एंव साहित्य संगीत, अभिनय कला के विकास का पथ प्रशस्त हुआ। इसके अतिरिक्त शासन की विभिन्न योजनाओं को भी इसके माध्यम से प्रचार मिला। वर्श 1984 में शासन द्वारा एक महाविधालय की स्थापना की गर्इ।15 अगस्त 2011 को छत्तीसगढ़ के माननीय मुख्यमंत्रीजी ने इसके विकास को देखते हुए इसे राजस्व जिला घोषित किया। निश्चय ही जिला निर्माण से कोण्डागांव जिला छत्तीसगढ़ का एक आर्दश जिला बनेगा एवं ख्याति अर्जित करेगा। ( उक्त इतिहास सर्व श्री टी.एस. ठाकुर,सुरेन्द्र रावल, उजियार देवांगन, हरिहर देवांगन, महेष पाण्डे, कोतवाल सुकालू, गोपाल पटेल एवं खेम वैश्णव से प्राप्त जानकारी के अनुसार लिया गया है।)